मोहर्रम पर पैकियों का निशान गुलजार न करने और जुलूस नहीं निकालने का फैसला
कानपुर। कोरोना वायरस के चलते इस वर्ष मोहर्रम में न तो पैकियों का निशान गुलजार होगा न ही जुलूस निकाला जाएगा। मोहर्रम की नौ तारीख को बड़ी कर्बला तक पैकी दौड़ भी नहीं लगाएंगे। 236 सालों में यह पहला अवसर होगा जब पैकियों का जुलूस नहीं निकलेगा। यह फैसला पैकियों के खलीफा शकील अहमद खान ने लिया है।
निशान-ए-पैक कासिद-ए-हुसैन के खलीफा शकील अहमद खान ने बताया कि कोरोना की वजह से इस वर्ष पैकियों का निशान गुलजार नहीं होगा। न पैकियों की कमर बंधाई होगी, न ही जुलूस निकाला जाएगा। उन्होने कहा कि अगर कोई पैकी बन कर गश्त करता है तो वह खुद जिम्मेदार होगा। उन्होने कहा कि जो लोग निशान की मन्नत मांगते हैं वे घरों पर ही फातिहा कराएं।
मोहर्रम में हर वर्ष लाखों लोग पैकी बनते हैं। यह सिलसिला वर्ष 1784 से चला आ रहा है। इसकी शुरुआत दायम खान ने की थी। अब उनकी पांचवीं पीढ़ी पैकियों का नेतृत्व कर रही है। मौजूदा वक्त में तकरीबन डेढ़ लाख लोग पैकी बनते हैं। नौ मोहर्रम की रात को लाखों पैकी बड़ी कर्बला नवाबगंज तक दौड़ते हैं। मोहर्रम की दस तारीख को पैकियों की कमर खोली जाती है और नियामत बांटी जाती है।
मोहर्रम से पहले ऑल इंडिया शिया युवा यूनिट ने शहर की कर्बलाओं व इमाम बारगाहों को सैनिटाइज करने का अभियान चलाया है। अभियान की शुरुआत बड़ी कर्बला नवाबगंज से की गई। संस्था के महासचिव नायाब आलम ने कहा कि कोरोना से बचाव के लिए अभियान की शुरूआत की गई है। सैनिटाइजेशन अभियान में दानिश रिजवी, शारिब अब्बास, मोहम्मद रजा आदि रहे।